

✍️ लेखक : जयदेव राठी
भारत के प्रमुख शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक अक्सर 300-500 के बीच पहुंच जाता है, जबकि 50 से कम को ही स्वस्थ माना जाता है। दिल्ली, जो दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल है, में पीएम 2.5 का स्तर डब्ल्यूएचओ के मानक से 10-15 गुना अधिक रहता है। यह सूक्ष्म कण इतने छोटे होते हैं कि ये सीधे हमारे फेफड़ों में प्रवेश कर हृदय और मस्तिष्क तक पहुंच जाते हैं।लैंसेट की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वायु प्रदूषण से हर साल लगभग 2.3 मिलियन समयपूर्व मौतें होती हैं। इनमें से 6.7 लाख मौतें केवल बाहरी वायु प्रदूषण से, जबकि 4.8 लाख मौतें घरेलू वायु प्रदूषण से होती हैं। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और पश्चिम बंगाल सबसे अधिक प्रभावित राज्य हैं।
आर्थिक दृष्टि से देखें तो वायु प्रदूषण भारत की जीडीपी का लगभग 3% नुकसान पहुंचाता है। यह लगभग 8-9 लाख करोड़ रुपये के बराबर है, जो चिकित्सा व्यय, उत्पादकता में कमी और असमय मृत्यु से जुड़े आर्थिक नुकसान को दर्शाता है।
हमारे शहरों में प्रदूषण के कई स्रोत हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआं कुल प्रदूषण का 20-30% है। दिल्ली में ही 1.2 करोड़ से अधिक वाहन पंजीकृत हैं। औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण गतिविधियां, पराली जलाना, और कोयला आधारित बिजली संयंत्र अन्य प्रमुख कारण हैं
पंजाब और हरियाणा में अक्टूबर-नवंबर में लगभग 23 मिलियन टन पराली जलाई जाती है, जो दिल्ली- एनसीआर क्षेत्र में प्रदूषण का 25-30% योगदान करती है। यह सिर्फ एक महीने में इतना प्रदूषण फैलाती है कि पूरे क्षेत्र की हवा जहरीली हो जाती है।
घरों में लकड़ी, गोबर के उपले और कोयले का उपयोग भी गंभीर चिंता का विषय है। भारत में लगभग 50 करोड़ लोग अभी भी खाना पकाने के लिए ठोस ईंधन का उपयोग करते हैं, जिससे घरेलू वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है। हालांकि देखने मे आया है कि पिछले कुछ सालों से पराली जलाने की घटनाओं मे कमी आई है।
वायु प्रदूषण का सबसे भयावह पहलू यह है कि यह धीरे-धीरे हमारे शरीर को नष्ट करता है। श्वसन संबंधी रोग, हृदय रोग, फेफड़ों का कैंसर, स्ट्रोक, और डायबिटीज जैसी बीमारियां सीधे प्रदूषण से जुड़ी हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वायु प्रदूषण से हर साल विश्वभर में लगभग 70 लाख लोगों की असमय मृत्यु हो जाती है। भारत में यह आंकड़ा 12-15 लाख के बीच है। यह संख्या सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि 12 लाख परिवारों के टूटने, बच्चों के अनाथ होने, और माता-पिता के असमय बुढ़ापे में सहारा खो देने की दास्तान है।
बच्चों पर इसका प्रभाव और भी गंभीर है। सयुंक्त राष्ट्र बाल कोष की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 17 करोड़ से अधिक बच्चे ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां वायु प्रदूषण डब्ल्यूएचओ के मानकों से 6 गुना अधिक है। इन बच्चों के फेफड़ों का विकास प्रभावित होता है, आईक्यू लेवल कम होता है, और भविष्य में गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। गर्भवती महिलाओं के लिए प्रदूषण विशेष रूप से खतरनाक है। अध्ययन बताते हैं कि प्रदूषित हवा में सांस लेने से समय से पहले जन्म, कम वजन वाले बच्चे और गर्भपात का खतरा 15-20% तक बढ़ जाता है।वृद्धों के लिए तो यह और भी घातक है। 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में प्रदूषण से हृदयाघात का खतरा 35-40% तक बढ़ जाता है। प्रदूषण केवल शारीरिक स्वास्थ्य को ही नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। स्कूल बंद होते हैं, बाहरी गतिविधियां रुक जाती हैं, मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। दिल्ली में 2023 में प्रदूषण के कारण स्कूल 15 दिनों से अधिक बंद रहे।
खिलाड़ियों को अभ्यास करने में कठिनाई होती है। 2017 में दिल्ली में खेली गई एक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच में श्रीलंकाई खिलाड़ियों को सांस लेने में तकलीफ हुई थी। यह हमारी राजधानी की शर्मनाक तस्वीर थी। पर्यटन उद्योग प्रभावित होता है। विदेशी पर्यटक प्रदूषण के मौसम में भारत आने से कतराते हैं। यह हमारी अर्थव्यवस्था के लिए भी नुकसानदायक है। दिल्ली मे प्रदूषण के कारण हर रोज करोड़ों का व्यापार प्रभावित हो रहा है। सबसे पहले, सरकारी स्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना, औद्योगिक उत्सर्जन पर सख्त नियंत्रण, और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ना जरूरी है। दिल्ली में ऑड-ईवन योजना और ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान जैसे प्रयास सही दिशा में कदम हैं, लेकिन ये पर्याप्त नहीं हैं।पराली जलाने की समस्या का दीर्घकालिक समाधान किसानों को विकल्प उपलब्ध कराना है। मशीनरी की सब्सिडी, फसल अवशेष प्रबंधन तकनीक, और बायोमास ऊर्जा संयंत्र स्थापित करना आवश्यक है। व्यक्तिगत स्तर पर भी हम योगदान कर सकते हैं। कारपूलिंग करें, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें, पेड़ लगाएं, और कचरा जलाने से बचें। घर में एयर प्यूरीफायर लगाएं, खासकर जहां बच्चे और बुजुर्ग हों।सबसे बड़ी चिंता यह है कि हम अपनी अगली पीढ़ी को क्या विरासत दे रहे हैं? जब आज का बच्चा बड़ा होगा, तो क्या उसे स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार मिलेगा? क्या वह खुले आसमान तले बिना मास्क के खेल सकेगा? विश्व बैंक की एक रिपोर्ट कहती है कि यदि प्रदूषण की वर्तमान दर जारी रही, तो 2050 तक भारत में वायु प्रदूषण से होने वाली मौतें दोगुनी हो सकती हैं। यह एक भयावह भविष्य की ओर इशारा करता है।
प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। यह हम सबकी लड़ाई है। हर नागरिक को यह समझना होगा कि स्वच्छ हवा हमारा मौलिक अधिकार है और इसे बचाने की जिम्मेदारी भी हमारी है।
हमें अपनी जीवनशैली बदलनी होगी। आरामदायक निजी वाहन की जगह पर्यावरण के प्रति जागरूक विकल्प चुनने होंगे। अधिक पेड़ लगाने होंगे, प्लास्टिक का उपयोग कम करना होगा, और अक्षय ऊर्जा को अपनाना होगा। जिंदगी की हर सांस अनमोल है। लेकिन जब यही सांस जहर बन जाए, तो जीवन का क्या अर्थ रह जाता है? प्रदूषण एक मौन हत्यारा है जो हर दिन हजारों लोगों की जान ले रहा है। यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि मानवता के अस्तित्व का सवाल है। आज जरूरत है एक सामूहिक जागरूकता और कार्यवाही की। हर व्यक्ति, हर परिवार, हर समुदाय को आगे आना होगा। सरकारी नीतियों को सख्ती से लागू करना होगा और जनता को जिम्मेदारी से काम लेना होगा।
याद रखें, हम धरती के मालिक नहीं, बल्कि संरक्षक हैं। हमें इसे अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखना है। स्वच्छ हवा, स्वच्छ पानी, और स्वच्छ पर्यावरण हर इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार है।
आइए, मिलकर प्रण करें कि हम प्रदूषण के खिलाफ लड़ेंगे। हम अपने बच्चों को एक स्वस्थ और हरा-भरा भविष्य देंगे। क्योंकि जब सांसें साफ होंगी, तभी जिंदगी खूबसूरत होगी।
हवा है तो जीवन है, जीवन है तो कल है। आइए, अपने कल को बचाएं।”










